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टनकपुर का प्रसिद्ध पूर्णागिरि मंदिर: नवरात्र में उमड़ता है आस्था का सैलाब

टनकपुर । उत्तराखंड के चंपावत जिले के टनकपुर से 24 किमी दूर अन्नपूर्णा चोटी पर मां पूर्णागिरि का धाम बसा है। माता सती के 51 शक्तिपीठों में से एक यह धाम है। बताया जाता है कि जब मां सती को जलते हुए भगवान शिव ले जा रहे थे, तो भगवान विष्णु ने अपने चक्र से वार कर मां सती के 51 टुकड़े किए थे। जो शक्तिपीठों के रूप में जाना जाता है। यहां मां सती की नाभि गिरी थी। जिसे मां पूर्णागिरि के रूप में पूजा जाता है।

भारत के ही नहीं बल्कि नेपाल भी श्रद्धालु दर्शन के लिए बड़ी संख्या में पहूंचते हैं। सर्व मनोकामना पूर्ण करने वाली माता पूर्णागिरि उत्तर भारत के सुप्रसिद्ध देवस्थलों में से एक है। वर्ष भर यहां दर्शन पूजन चलता है, लेकिन चैत्र नवरात्र से पहले करीब 90 दिनों तक चलने वाले विशेष मेला के दौरान यहां करीब 30 लाख से अधिक भक्त माता का आशीर्वाद लेते हैं। मां पूर्णागिरि मंदिर के दर्शन के बाद सिद्ध बाबा के दर्शन करने पर धार्मिक यात्रा सफल मानी जाती है। नेपाल में सिद्धबाबा का मंदिर स्थापित है और मां पूर्णागिरि के दर्शन के बाद भक्त सिद्धबाबा मंदिर में शीश नवाते हैं।

इतिहास:

1632 में श्रीचंद तिवारी ने यहां पर मंदिर की स्थापना की और माता की विधिवत पूजा-अर्चना शुरू की।
कहा जाता है कि जब सती ने अपने पिता दक्ष के यज्ञ में अपमानित होकर स्वयं को जला डाला तो भगवान शिव उनके पार्थिव शरीर को आकाश मार्ग से ले जा रहे थे तो अन्नपूर्णा चोटी पर जहां नाभि गिरी।
उस स्थल को पूर्णागिरि शक्तिपीठ के रूप में पहचान मिली।
संवत 1621 में गुजरात के श्री चंद तिवारी यमनों के अत्याचार के बाद जब चंपावत के चंद राजा ज्ञान चंद के शरण में आए तो उन्हें एक रात सपने में मां पूर्णागिरि ने नाभि स्थल पर मंदिर बनाने का आदेश दिया और 1632 में धाम की स्थापना कर पूजा-अर्चना शुरू हुई।
तब से ही यह स्थान आस्था, भक्ति और श्रद्धा की त्रिवेणी बना हुआ है।

विशेषता:

यहां पहुंचने वाले हर भक्त की मुराद जरूर पूरी होती है। यहां वर्ष भर श्रद्धालु शीश नवाते हैं।
चैत्र और शारदीय नवरात्र में तो इस धाम में भक्तों का रेला उमड़ पड़ता है।
उत्तर भारत के साथ नेपाल से भी भारी संख्या में श्रद्धालु यह मां के दर्शन को आते हैं ।
शक्तिपीठ में पहुंचने से पूर्व भैरव मंदिर पर बाबा भैरवनाथ का वास है। वह उनके द्वारपाल के तौर पर खड़े हैं। उनके दर्शन के बाद ही मां के दर्शनों की अनुमति मिलती है। जहां वर्ष भर धूनी जली रहती है।
साथ ही झूठे का मंदिर भी लोगों को अपनी ओर आकर्षित करता है।
मां काली मंदिर में भी लोग पहुंच मन्नत मांगते है।

मान्यता :

मां पूर्णागिरि धाम में झूठा मंदिर की भी पूजा की जाती है।
कहावत है कि किसी सेठ ने पुत्र रत्न प्राप्त होने पर मां के दरबार में सोने का मंदिर चढ़ाने की प्रतिज्ञा की थी।
मन्नत पूरी होने के बाद लोभवश उस सेठ ने तांबे में सोने का पानी चढ़ाकर मंदिर बनवाया।
जब मजदूर उस मंदिर को धाम की ओर ले जा रहे थे तो विश्राम के बाद वह मंदिर वहां से नहीं उठ सका।
तब से इसे झूठे मंदिर के रूप में जाना जाता है और मां पूर्णागिरि के दर्शन के बाद श्रद्धालु इस मंदिर में भी पूजा करते हैं।

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